9 अगस्त 1942 से 2026 तक: सी.पी. राधाकृष्णन ने याद किया भारत छोड़ो आंदोलन की 84वीं वर्षगांठ

Rajya Sabha Chairman CP Radhakrishnan speaking in Parliament during Quit India Movement 84th Anniversary
राज्यसभा सभापति श्री सी.पी. राधाकृष्णन भारत छोड़ो आंदोलन की 84वीं वर्षगांठ पर सदन को संबोधित करते हुए। 
`Source: SansadTV`


भारत छोड़ो आंदोलन की 84वीं वर्षगांठ: राज्यसभा सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने शहीदों को दी श्रद्धांजलि

नई दिल्ली, 7 अगस्त 2026: राज्यसभा के सभापति श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने भारत छोड़ो आंदोलन की 84वीं वर्षगांठ के अवसर पर देश के स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि 9 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी के दूरदर्शी नेतृत्व में शुरू हुआ भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक ऐतिहासिक और निर्णायक अध्याय है, जिसने पूरे देश को आजादी के लिए एकजुट किया।

संसद टीवी (SansadTV) द्वारा साझा किए गए संदेश के अनुसार, सभापति ने कहा कि भारत छोड़ो आंदोलन केवल एक राजनीतिक अभियान नहीं था, बल्कि यह देशवासियों के आत्मसम्मान, साहस और स्वतंत्रता की सामूहिक आकांक्षा का प्रतीक था। उन्होंने आंदोलन में भाग लेने वाले सभी स्वतंत्रता सेनानियों के अद्वितीय साहस, त्याग और राष्ट्र के प्रति समर्पण को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

सभापति ने क्या कहा?

राज्यसभा सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने अपने संदेश में कहा कि भारत छोड़ो आंदोलन भारत के स्वतंत्रता संघर्ष का एक ऐसा मील का पत्थर है जिसने अंग्रेजी शासन की नींव को हिला दिया। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन में लाखों भारतीयों ने बिना किसी भय के स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया और अनेक लोगों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया।

उन्होंने यह भी कहा कि स्वतंत्रता सेनानियों का त्याग और संघर्ष आज भी देश की नई पीढ़ी को राष्ट्रभक्ति, एकता और निस्वार्थ सेवा की प्रेरणा देता है। उनके अनुसार, भारत छोड़ो आंदोलन का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 1942 में था।

भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत कैसे हुई?

भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत 9 अगस्त 1942 को हुई थी। इससे एक दिन पहले, 8 अगस्त 1942 को मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान (वर्तमान अगस्त क्रांति मैदान) में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक आयोजित की गई थी। इसी बैठक में महात्मा गांधी ने अंग्रेजों से भारत छोड़ने की मांग करते हुए ऐतिहासिक "करो या मरो" (Do or Die) का आह्वान किया।

महात्मा गांधी का मानना था कि अब समय आ गया है जब भारत को पूर्ण स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। उनके इस आह्वान ने पूरे देश में स्वतंत्रता की नई लहर पैदा कर दी और लाखों लोग आंदोलन से जुड़ गए।

अंग्रेजी सरकार की कार्रवाई

भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने के कुछ ही घंटों के भीतर अंग्रेजी सरकार ने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद सहित कांग्रेस के लगभग सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।

सरकार को उम्मीद थी कि नेताओं की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन समाप्त हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। देश के विभिन्न हिस्सों में आम लोगों, छात्रों, किसानों, महिलाओं और युवाओं ने आंदोलन की कमान संभाल ली। कई स्थानों पर प्रदर्शन हुए, हड़तालें की गईं और अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनआंदोलन तेज हो गया।

स्वतंत्रता संग्राम में आंदोलन का महत्व

इतिहासकारों के अनुसार, भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे प्रभावशाली आंदोलनों में से एक माना जाता है। इस आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय जनता अब अंग्रेजी शासन को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थी।

हालांकि आंदोलन के दौरान अनेक लोगों को जेल भेजा गया और कई स्थानों पर दमनात्मक कार्रवाई हुई, फिर भी जनता का उत्साह कम नहीं हुआ। इस आंदोलन ने स्वतंत्रता की मांग को और अधिक मजबूत बनाया तथा ब्रिटिश शासन पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दबाव बढ़ा।

अगस्त क्रांति दिवस क्यों मनाया जाता है?

हर वर्ष 9 अगस्त को पूरे देश में अगस्त क्रांति दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को याद किया जाता है और देश की आजादी के लिए उनके बलिदान को श्रद्धांजलि दी जाती है।

स्कूलों, कॉलेजों, सरकारी संस्थानों और विभिन्न संगठनों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास पर चर्चा की जाती है तथा नई पीढ़ी को देशभक्ति और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जागरूक किया जाता है।

संसद में भी किया गया स्मरण

राज्यसभा के मानसून सत्र के दौरान सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने भारत छोड़ो आंदोलन की 84वीं वर्षगांठ का उल्लेख करते हुए स्वतंत्रता सेनानियों को नमन किया। उन्होंने कहा कि भारत की आजादी लाखों लोगों के संघर्ष और बलिदान का परिणाम है और देश को उनके योगदान को सदैव स्मरण रखना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत छोड़ो आंदोलन हमें राष्ट्रीय एकता, लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का एहसास कराता है। यह आंदोलन केवल इतिहास का विषय नहीं है, बल्कि वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है।

आज के समय में भारत छोड़ो आंदोलन की प्रासंगिकता

भारत छोड़ो आंदोलन का संदेश आज भी देशवासियों को यह याद दिलाता है कि राष्ट्रीय हित सर्वोपरि है। लोकतंत्र को मजबूत बनाने, सामाजिक एकता बनाए रखने और संविधान के मूल्यों का सम्मान करने में प्रत्येक नागरिक की भूमिका महत्वपूर्ण है।[भारत छोड़ो आंदोलन के बारे में विस्तार से जाने]

महात्मा गांधी द्वारा दिए गए सत्य, अहिंसा, आत्मबल और जनभागीदारी के सिद्धांत आज भी समाज और राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरणा देते हैं। यही कारण है कि भारत छोड़ो आंदोलन को केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक चेतना का महत्वपूर्ण आधार माना जाता हैं।

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